मंगलवार, 8 मई 2018

"कहानी" हरिया किसान की।


दुखी मन से हरिया अपनी लाठी, बैलों की रस्सी लेकर घर से खेत जाने की कहकर घर से निकला, वह शायद दुखी इसलिए भी था कि उसके दोनों बच्चे नए कपड़े लाने की जिद कर रहे थे,खिलौने तो उसने माटी के बनाकर जैसे तैसे उनको मनाकर दे दिए थे।
बच्चों की जिद सुनकर हरिया की बीबी जो कोने में बैठी थी गंभीरता को भांपते हुए बोली-" बिटवा जिद नाही करा ,तोहार बापू के पास अबै पैसा नाही आय जब होई ता बिना कहे लय अइ"।
उसकी इस बात में शायद ये दर्द भी छुपा था कि खेती में इतनी बचत कँहा होती है कि व्यवस्थाओं के नाम पर खर्च कर लिए जाएं, मन ही मन वह सोच रही थी कि 10 बरस हो गए शादी हुए, हरिया ने उसे महज 2 बार ही साड़ी लेकर दी थी वो भी इतबारी बाजार के ठेले में मिलने वाली क्योंकि उसका बजट बस इतना ही स्वीकृति देता था?
वह अच्छी तरह जानती थी इसलिए बच्चों को सांत्वना दे रही थी जिसकी वह खुद 10 बरसों से कृपा पात्र थी!
मगर बच्चे थे कि जिद पर अड़े थे,बचपन को कँहा पता होता है कि गरीबी क्या होती है फसल क्या होती है और नुकसान क्या होता है?
बचपन तो स्वछन्द होता है जिसकी कोई सीमाएं नही होती वह बिना रोके टोक हर चीज पाने को लालायित रहता है।
माँ ने समझाया उसका समझाना जब व्यर्थ साबित होता नजर आया तो हरिया ने  चहेरे पर झूठी मुस्कान के साथ बच्चों की माँग को बदलने का प्रयास करते हुए कहा-"जल्दी जल्दी बतावा बेर(एक फल जो शबरी ने राम को खिलाए थे) अउर जंगल जलेबी केही केही खाने है"
बचपन तो पचपन होता है सारी आकांछाएँ भूल कर अपने मुँह में पानी भरते हुए खुसी से उछल पड़े-"बापू वई बेलहा हार से जौन ल्याये तै,उ ता गजबई गुरतुर रहीं हैं" हरिया ने मंद मुस्कान बिखेरी उसे लगा कि चलो कम से कम बच्चों ने जिद तो छोड़ी।
हरिया की बीबी ने हरिया की तरफ देखकर मानो मन ही मन यह कह दिया हो कि बातें बनाना तो कोई आप से सीखे ,मेरी साड़ी यही कह कर हर बार वादों में ले आते हो कि अबकी फसल अगर अच्छी हुई तो इस बार की और पिछली सारी की सारी साड़ी एक साथ ला दूँगा।
हरिया चैन की साँस लेता इससे पहले ही सोसायटी वाले ग्राम सेवक घर पर आए, भौहें तानते हुए बोले -"हरिया खाद बीज का पैसा कब दे रहे हो ? ये लो नोटिस अमुक तारीख को अगर पैसा नही दोगे तो डिफाल्टर हो जाओगे और ऐसा चलता रहा तो जमीन कुर्क कर लेगी सरकार कहे देता हूँ"।
हरिया ने पानी का गिलास देते हुए कहा-"साहब ई बार सब तो सूख गा है ,खाबे के लाले पड़े हैं कर्जा कइसन देब कुछ समझ मा नहीं आय रहा है,लेकिन हम पाई पाई चुका देब अपना विश्वास रखी"
विश्वास रखी ,तेरे इस विश्वास से सोसायटी और सरकार नही चल रही,विश्वास का तू ही अचार डाल लें,हमे तो वसूली करनी है पैसा तो देना ही पड़ेगें यह कहते हुए ग्राम सेवक दूसरे हरिया की तलाश में निकल गया।
हरिया के माथे पर चिंता की लकीरें एक बार फिर उभरीं, वह सोच रहा था कि वह करे तो क्या करे, बीबी बच्चों को जीने योग्य सुविधाएं ,शिक्षा  तक दे नही पा रहा ऊपर से एक नई मुसीबत।
गाँव के व्यौहर से 10 रुपये सैकड़ा प्रति महीना सूद से 10000 ले रखे हैं वो अलग.... तो क्या उधार न लेता तो बिटिया को मर जाने देता अभी तो फूल सी थी ,डॉक्टर सहाब कहते थे बड़े अस्पताल में दिखवाओ बहुत गहरा पीलिया है बचना मुश्किल है।
यह सोचता हुआ वह बच्ची की ओर देखता है आँखों का पानी उसकी पुतलियों को गीला तो करता है लेकिन बाहर नही आ पाता, फिर उसे याद आता है कि 5 साल हो गए लेकिन अब तक मूल नही लौट पाया जाने कितने 10000 उसने सूद में चुका दिए।
हरिया की बीबी ने थाली सामने रखते हुए कहा-"हमार मानो चिन्ता न करो ,राम सब ठीक करिहैं, खाना खाय ल्या ,आज-काल से गेंहूँ केर कटाई भी तो करें खा पड़ी"
हरिया ने एक रोटी खाते हुए कहा-"हर जनम मा तोहार जैसी मेहरिया मिले बस यहै बिनती राम से करी थे"

शाम की लालिमा आकाश में छाई थी ,कोई बड़ी तेजी से हरिया के घर के दरवाजे पीट रहा था-"भौजी दरवाजा ख्वाला.....जल्दी खोला" उसकी आवाज में एक अलग ही कर्कशता थी ।
दरवाजे खोलते ही हरिया की बीबी बोली-"का होइगा पुत्तन भैया,कहे चिल्लाय रहै"
पुत्तन की मानो घिघ्घी बंध गई..."ब्वाला कि अइसय ठाढ़ राहिहा" हरिया की बीबी ने कहा।
भौजी हरिया......हाँ का होइगा!
बड़ी लाईन केर तार टूट गए ता सबरे खेत केर फसल जल गय!
लोग बताउत रहे हरिया बेर के पेड़ मा फाँसी लगा लिहिन हीं?



सर्वाधिकार सुरक्षित
©®योगेश मणि योगी'किसान'

सोमवार, 7 मई 2018

किसानों की आत्महत्या या हत्या??



पूरा पढ़ना अगर इंसान हो तो???

अगर आप सुबह शाम की थाली चट कर जाते हैं और एक बार भी उस #अन्नदाता के बारे में नही सोचते तो जान लीजिए आप चाहे जितना कर्म कर लो सब व्यर्थ है?

#नेताओं,#उद्योगपतियों के खानदान में कितने लोगों ने तंगी और आर्थिक परेशानी के कारण #आत्महत्या की है, हमको आपको ये नेता, सत्ता,संगठन, भारत आजद होने के बाद विकास की जगह  मंदिर-मस्जिद,हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई,गाय ,धर्म, जाति आदि आदि के प्रपंच रचकर व्यस्त रखते हैं और हम इनके जाल में उलझे हैं ,यह बात याद रखना की इनका मकसद सिर्फ राजनीति है आम जन और किसानों का विकास नही।
इनका मकसद अँग्रेजों,मुगलों से भी गया गुजरा है ये आपकी खून की अंतिम बूँद तक चूष लेंगे,ये उद्योगपतियों के पाले पोषे वो नाग हैं जिनके चेहरे पर तो मासूमियत है लेकिन जहर कोबरा से भी खतरनाक है!
जागो यह भारत किसी के बाप की बपौती नहीं किसानों और गरीबों तुम्हें तुम्हारा हक नही मिलता तो ये अट्टालिकाएँ छीन लो और इनकी हुकूमत में आग लगा दो, घुट घुट के आखिर कब तक जिओगे, ये मलाई छाने और हम जहर पियें आत्महत्या करें, ऐसा कब तक चलेगा आज़ादी के बाद से आज तक सिर्फ नारे और भाषण विकास का सारा धन चन्द लोगों की मुट्ठी में,हालात जैसे के तैसे???

पहन कर लखलखा खद्दर वतन के रहनुमा बनते,
निभाते एक न वादा सजे मंचों से जो कहते,
बना जन रट्टू तोता है जो तेरे जाल में फंसता,
तुम्हें खुद याद न रहता कँहा किससे हो क्या कहते,

बिका ईमान है तेरा नजर फसलें नहीं आतीं,
बहुत बातें यँहा होतीं मगर असलें नहीं आतीं,
न जाने क्यों तुम्हें नफरत हुई मेरे किसानों से,
बने क्यों मूर्ख फिरते हो तुम्हें अकलें नहीं आतीं,

करोगे जो कभी मेहनत किसानी जान जाओगे,
कटाई कर लो एकड़ भर तो हमको मान जाओगे,
चलाओ मुँह न मंचों से रहो औकात में अपनी,
दराती जो उठा ली तो हमें पहचान जाओगे,



सर्वाधिकार सुरक्षित
©®योगेश मणि योगी 'किसान



गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

देश की बुनियादी समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट कराती और मृतक बच्चों को श्रद्धांजलि देती रचना-

बुनियादी सुविधाएं चाहिए मेरे हिंदुस्तान में,
ऐश अमीरी जिनको प्यारी जाएं पाकिस्तान में,
फिर मासूमों ने बलि दी है जिनको कुछ भी पता नहीं,
देश की घटिया राजनीति को फिर भी कोई खता नहीं,
कितने फाटक खुले पड़े हैं उनमें कोई रोक नहीं,
आने जाने वालों की क्यों उनमें कोई टोक नहीं,
बजट नही क्या इतना भी की फाटक कोई लग जाये,
बुलेट ट्रेन से नीचे सोचो तो दुर्घटना टल जाए,
नही जरूरत बुलट ट्रेन की नही चाँद में जाने की,
इंसानो को सिर्फ जरूरत बेसिक चीजें पाने की,
राजनीति की होड़ में तुम भी देश बनाना भूल गए,
जिन सपनो को सींचा हमने वो सारे ही शूल भए,
कभी ख़तम होती ऑक्सिजन कभी दवाई न मिलती,
फिर भी बाँछे खिली तुम्हारी कुर्सी तक है न हिलती,
क्योंकि तुमको मतलब न है जन मानस की पीड़ा से,
उनकी तुलना शायद करते तुछ नाली के कीड़ा से,
राजनीति में जनता के दुख दर्दों से तुम प्यार करो,
जैसा जिम्मा तुमको सौंपा वैसा तो अब काम करो,

सर्वाधिकार सुरक्षित
©®योगेश योगी


मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

दलित के नाम पर थाली का ऐसे भोज न खाओ,
हकीकत जानते सब हैं न ऐसे ढंग दिखलाओ,
नही सुविधाएं घर पर हैं किराए का समां देखो,
जरा बेवकूफियों से तुम नेताओं खार तो खाओ,
कभी हालात न सुधरे तुम्हारे भोज खाने से,
वतन तो खा रहे हो सब हमारा चैन न खाओ,
कभी जो सोचते हमको दलित सा नाम न होता,
हमें सोचो ह्रदय से और रोटी बेटी अपनाओ,
नही कर सकते हो ऐसा तो कैसे उन्नति आये,
बने हैं वोट के ही बैंक जरा ये सच तो बतलाओ,

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योगेश योगी

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

सुन लो नेताओं तुम्हारी औकात सिर्फ तुम्हारे लिए अर्ज किया है,और उनके लिए भी जो किसान को आतंकी नक्सली और हिंसक कहते हैं-

दर्द कभी न समझ सकोगे भूमिपुत्र किसानों के,
पैदाइश हो लगता मुझको सच मे तुम हैवानों के,
तुम क्या जानो कभी खेत मे कैसे क्या क्या होता है,
कतरा कतरा उसके खूँ का कँहा समाहित होता है,
तुमने समझा वोट बैंक है जिसका काम किसानी है,
उनके हक को न देते यह सीधी सी बेईमानी है,
कभी उतरकर देखो थल पर ठंडी की उन रातों में,
या फिर धान की पौध लगाते कीचड़ के बरसातों में,
घुटने तक जब गड़कर भू में थोड़ा समय बिताओगे,
शायद उसके दर्द को काफिर महसूस कर पाओगे,
कमर लचक कर *निहुरे-निहुरे दिनभर करे निदाई है,
उसकी हालत उसकी पीड़ा कहती फटी बिमाई है,
सर पर रखकर बोझा उसने फसल दुपहरी में ढोई
उसकी किस्मत उसके दर्दों पर व्याकुल होकर रोई,
लिए दराती हाथ पकड़कर खेत काटता दिनभर है,
उसकी पीड़ा पर ऊपर से *लेत परीक्षा दिनकर है,
कोल्हू के हाँ कोल्हू के बैल के जैसा पिसता है,
सत्ता के हाँ सत्ता के दल्लों तुम्हे न दिखता है,
जिस किसान का जीवन सारा देश बनाने में गुजरा,
उसके हक पर चढ़कर तुमने नित्य जमाया है मुजरा,
तुमने उस ईश्वर का रुतवा पैरों तले है कुचल दिया,
उसके हक को सत्ता की कुर्सी की खतिर कुचल दिया,
उसकी फसल का पैमाना क्या कभी नही तुम चाहोगे,
कब तक तलवे उद्योगों के पतियों के तुम चाटोगे,
एक छोटी सी सुई की कीमत तय करते वो कैसे हैं,
हमने देश का पेट भरा है हम जैसे के तैसे हैं,
क्या हमको अधिकार नही है लागत को तय करने का,
इतना भी क्या हक न दोगे ,हक देदो फिर मरने का,
#बलात्कार मेरी फसलों का मंडी पर नित होता है,
मेरे लिए ये मेरा भारत खड़ा कभी न होता है,
ऐसा चलता रहा तो सुन लो फिर हथियार उठायेंगे,
जो जो हक में न बोलेगें, सर उनके काटे जाएंगे,

बघेली शब्द-
*निहुरे-निहुरे =कमर के बल झुकना,झुक जाना
*लेत- लेना
छायाचित्र-साभार

योगेश मणि 'योगी'
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गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

#बेटियों के चीरहरण पर दुष्सासनों से सवाल करती और बेटियों को श्रद्धांजली देती मेरी रचना-

चीखों में जब बेटी की किलकारी का दम घुट जाए,
हैवानों के आगे जब जब नारी बेवस हो जाए,
तब तब भारत प्रश्न पूँछता सत्ता के अय्याशों से,
राजनीति की देश विरोधी टेढ़ी मेढ़ी चालों से,
क्यों बेटी की अस्मत लूटी जाती है दरबारों में,
मंदिर मस्जिद स्कूलों और भीड़ भरे बाजारों में,
जब सत्ता भी हामी भरकर सबको धता बताती हो,
बेटी की अस्मत ही जब घर इनके लूटी जाती हो,
भारत का उत्थान करोगे कैसे हमें बताओ जी,
कोठे बंगले में चीखें हैं उनसे खार तो खाओ जी,
धर्म और भारत के रक्षक तुमको कैसे मानें हम,
नारी के ऊपर हमला हो चुप्पी कैसे साधें हम,
नारी कोई वस्तु नही है जब जी चाहे भोग करो,
हिम्मत है तो एक बार, खुद की बेटी से योग करो,
नामर्दों की भीड़ जुटा के भगवा राष्ट्र बनाओगे,
विश्व गुरु के सपने देकर ऐसे कृत्य कराओगे,
तुमसे अच्छी नगर वधू है तन का सौदा करती है,
घर के अंदर पेट की खातिर चाहे जो भी करती है,
तुमने तो सपने दिखलाकर के हरकत ओछी करते हो,
किस मुँह से फिर वंदे वंदे भारत की जय कहते हो,
जिस मुद्दे में देश जलेगा कोर्ट भी उस पर बोलेगा,
यस सी,यस टी/तीन तलाक की ही फ़ाइल खोलेगा,
आँखों से पट्टी खोलो और इनपर भी संज्ञान करो,
न्यायपालिका की आत्मा को न ऐसे नीलम करो,
सत्ता सुनले कान खोल गर इज़्ज़त लुटती जाएगी,
बेटी पैदा कौन करेगा कोख में मारी जाएगी,



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©®योगेश मणि योगी
१३०४२०१८
#जम्मू_कठुआ अबोध बालिका #आसिफा पर बदले की भावना से की गई वहशी क्रूरता पर बालिका को श्रद्धांजलि अर्पित करते मेरे विचार-

यह मेरे भारत की विचारधारा नही हो सकती,हिन्दू धर्म कभी बदला नही लेता वह सहिष्णु है वह मानव धर्म का पालन करने वाला है, लेकिन अब क्या??
धर्म के ठेकदरों ने धर्म को तहस नहस कर दिया, कँही यह तथाकथित धर्म के ठेकेदारों द्वारा धर्म और ईश्वर के अस्तित्व को निस्तोनाबूत करने की साज़िश तो नहीं।
रावण को हर साल मात्र इसलिए जलाया जाता है कि उसने माता सीता का मात्र अपहरण किया था?
इन रावणों का क्या माफ करियेगा इनको रावण कहना उचित नही ,इन दुष्ट, पापी,कलंकी,नीच,अधर्मी, जो धर्म की आड़ में भगवे की आड़ में ऐसे कुकृत्य को कर रहे हैं ,क्या कोई राम है जो इन भेड़ियों का मर्दन करेगा?
और उन लोगों का क्या होगा जो इन पापियों को बचाने के लिए आगे आएंगे,क्या उनकी बेटी के साथ इतनी ही दरिंदगी के साथ 7 लोगों ने यह अनाचार किया होता तो वह न्याय न माँगते?
हे राम यह तुम्हारे होने पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देगा? अगर ऐसा ही चलता रहा??दुनिया अट्टाहास करेगी कि देखो देखो एक छोटी सी भूल की सजा रावण को देने वाले, अपने आप को मर्यादा पुरुषोत्तम कहने वाले राम ने इन दुष्टों पर अपना वज्रपात क्यों नही किया?


लेख सर्वाधिकार सुरक्षित
©®योगेश योगी

ईद मुबारक #Eidmubarak

  झूठों को भी ईद मुबारक, सच्चों को भी ईद मुबारक। धर्म नशे में डूबे हैं जो उन बच्चों को ईद मुबारक।। मुख में राम बगल में छुरी धर्म ध्वजा जो ...