बुधवार, 4 दिसंबर 2019

हे नारी फूलन बन जाओ। #हे नारी फूलन बन जाओ

हे_नारी_फूलन_बन_जाओ , गीत मातृशक्ति पर नित हो रहे अत्याचार से आहत होकर महिलाओं के सम्मान में, नारी शक्ति को समर्पित, आप सबके आशीष की चाह में,


अब समय नहीं थामो बल्ला,
गोस्वामी झूलन बन जाओ।
हथियार उठा गोली दागो,
हे नारी #फूलन बन जाओ।।

ये सत्ताएं मदमस्त हुईं,
न फिकर इन्हें तेरी होती।
पैसे कुर्सी की लालच में,
बस इनकी है फेरी होती।।
इनको मारो ये जँहा मिलें,
धर पाँव वक्ष मे चढ़ जाओ।
हथियार उठा गोली दागो
        हे नारी.....

तुमने सृष्टि को जन्म दिया,
अपमान तेरा ही भारत मे।
तुमसे दुनिया है टिकी हुई,
फिर भी महिमा है गारत में।।
जिसने तेरा अपमान किया,
मारो उसको न मर जाओ।
हथियार उठा गोली दागो,
         हे नारी....

हे नारी यूँ न घूँट पियो,
अपमानों वाले प्यालों का।
हल गोली है ये याद रखो,
इन ह्रदय के गहरे छालों का।।
इज़्ज़त का बदला लेने को,
रणचंडी सी तुम तन जाओ।
हथियार उठा गोली दागो,
     हे नारी....

ये पुरुष सदा जो अहम करें,
समझें तुमको मनमौजी का।
सीने इनके छलनी कर दो,
अब रूप धरो तुम फौजी का।।
मन तनिक नहीं अधीर करो,
मारो इनको औ इतराओ।
हथियार उठा गोली दागो,
   हे नारी....

इनकी हस्ती का नाश करो,
सारे भारत पर राज करो।
सारे पुरुषों को दफन करो,
ज़िंदा गाड़ो ये काज करो।।
मरने पर इनके तनिक नहीं,
सोचो याकि तुम घबराओ।
हथियार उठा गोली दागो,
    हे नारी.....

मत सोच रखो ये हैं जीवन,
पुरुषों को न अभिमान कहो।
जो चुप बैठे वो भी दोषी,
इनको भी तुम शैतान कहो।।
प्रण इन दुष्टों के मर्दन का,
अबकी ऐसी सौगंध खाओ,
हथियार उठा गोली दागो,
      हे नारी फूलन..

ये ही वकील ये जज तेरे,
ये बलात्कार कर जाते हैं।
हो थाने या की राजनीति,
अपराधी बन कर आते हैं।।
साधु सन्याशी हो हकीम,
बंदूक कँहा जल्दी लाओ,
हथियार उठा गोली दागो,
          हे नारी....

इनकी चुप्पी से ही तेरी,
असमत को लूटा जाता है।
गलती पुरुषों की होती पर,
सब तुझ पर थोपा जाता है।।
इसलिए उठो ये धर्म कहे,
इनको मारो और तर जाओ।
हथियार उठा गोली दागो,
         हे नारी.....

गर भारत मे तुमको रहना,
हे नारी तुम टंकार करो।
न रहे शेष सर एक कोई,
सब पुरुषों का संहार करो।।
फिर कहता हूँ न एक बचे,
गौरव ऐसा तुम ही पाओ।
हथियार उठा गोली दागो,
       हे नारी फूलन बन जाओ।।
       हे नारी फूलन.....



©®योगेश योगी किसान
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रविवार, 3 नवंबर 2019

पराली पर हो हल्ला भूमाफिया की देन

हमारी #फसल साल में 2 बार आती है देश भर के तमाम प्रदूषणों से अगर किसानी के कचरे(पराली=गेंहू+धान)के प्रदूषण की तुलना की जाए तो वह मात्र 6% है।
जी हाँ सही पढ़ा आपने #छः प्रतिशत मात्र।
सारे देश मे किसानों के खिलाफ जो प्रपोगेंडा चलाया जा रहा है और उसे बिना सोचे समझे लोग किसानों को गालियाँ दे रहे हैं, उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। पूरी दिल्ली तख्तियाँ लेकर घूम रही है और वो भड़वे जो अपने आप को पर्यावरणविद कहते हैं वो भी इन प्रपोगेंडा वालों के साथ मिलकर विधवा विलाप कर रहे हैं।

आखिर #किसानों का इतना विरोध क्यों?

किसान इस देश का #अन्नदाता है यह हम सब जानते हैं बस मानते नहीं क्योंकि राजनीति की धृष्टता और सरकारों की मनमानी के साथ साथ दौलत वाली शहरी चमक से हमारी आँखें चौंधिया गई हैं। सरकार और अफसरशाही मिलकर दिल्ली के आसपास की सारी जमीनों से खेती बंद करवाना चाहती है ऐसा सिर्फ और सिर्फ #भूमाफिया के प्रभाव के चलते किया जा रहा है। क्योंकि सीना तान कर जो गगनचुम्बी इमारतें खड़ी की जा रही हैं वह कोई अंतरिक्ष मे नहीं खड़ी होनी वह खड़ी होनी है किसान के खेत पर और जब खेत बिकेगा ऐसा तभी सम्भव होगा।
और इस असम्भव से काम को संभव बनाने का सबसे अच्छा तरीका है , भूमाफिया+मीडिया+सरकार+अफसरशाही, भूमाफिया पूरा ब्लू प्रिंट तैयार करती है, दलाल #मीडिया इस प्लान को लोगों तक पहुँचाती है और सरकार उस ब्लू प्रिंट के हिसाब से नियम कानून बनाती है और जब इन थोपे गए नियम कानून को किसान सिरे से नकराते हैं तब अफसरशाही सामने आती है उन्हें हर तरीके से निपटाने के लिए।
कुल मिलाकर किसानों के खिलाफ एक ऐसा षड्यंत्र चल रहा है जिसकी कल्पना करना सबके बस की बात नहीं।
जाहिर है आप सोचते होंगे ऐसा नहीं और ऐसा सरकार क्यों करेगी उसे तो लोगों की सेहत का ख्याल है इसलिए जनहित में इतनी परेशान है।
यकीन मानिए अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आपकी सोच को जंग लग चुकी है।
किसी ने कहा था आदमी से सबकुछ छीनकर इतना मजबूर कर दो की साँस लेने मात्र को ही ज़िन्दगी समझने लगे और उसी को अहसान माने, बस यही तो ब्लू प्रिंट है जिस पर बड़ी तेजी से काम चल रहा है।
संगठित लूट इसे ही कहते हैं इस बात को आप उदाहरण से समझिए, कोई किसान फसल लेकर मंडी गया वँहा पर व्यपारियों का एक समूह जो फसल की खरीदी बोली लगाता है। वह किसान की फसल जिसका मूल्य 5000प्रति क्विंटल है को बोली संगठित रूपसे 3500से स्टार्ट करता है और 4000पर आकर खत्म कर देता है और किसान मजबूरी में फसल दे देता है।
लेकिन इसमे लुटता कौन है किसान।
बस कुछ इसी तरह का काम सरकार कर रही है, संगठित रूप से दलालों के साथ मिलकर किसानों को चारों तरफ से इतना मजबूर कर देगी,  किसान सरकार से खुद कहेगा कि अब किसानी बस में नहीं जीवन यापन का कुछ प्रबन्ध कर दो।
फिर क्या जिसका इंतेज़ार खत्म, सारी जमीने सरकार उद्योगपतियों को सौंप देगी जिनकी फैक्टरियाँ सरकार के हिसाब से शुद्ध ऑक्सीजन देती हैं और इको फ्रेंडली है ।

औऱ ये जनता सरकार से पूंछने की जगह किसानों को दोष देती है।
 मेरा भी एक प्रश्न है आज किसानों का विरोध वालों से? जब किसानों की फसल जल जाती है और किसान फाँसी लगा लेता है, तब क्या तुमने यही तख्तियाँ सरकार के खिलाफ कितनी बार उठाईं, कितनी बार कहा कि किसानों को न्याय दो, नहीं न! बस इसी हरकत और इसी घटिया सोच को शास्त्रों में हरामीपन की पराकाष्ठा कहा गया है।

फिक्र है जन की फसल को बो रहा हूँ मैं।
हर बार घाटा देख करके रो रहा हूँ मैं।
तूम भला क्या दर्द जानो मेरी मेहनत का,
देखकर हालात आपा खो रहा हूँ मैं।

©®
योगेश योगी किसान
फ़ोटो- 94% प्रदूषण(शहर) v/s 6% प्रदूषण(गाँव)

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

राम रावण

मेरी कविता #रावण का एक प्रश्न लिखने का दुस्साहस #रावण_क्यों_तुमसे_आज_जले प्रस्तुत है, आपकी प्रतिक्रिया आशिर्वाद स्वरूप आपेक्षित।

हे राम युद्ध मैं हार गया, सीता माता को छुआ नहीं।अपमान हुआ मेरा भी था, उसका बदला तक लिया नहीं।
तुमने मारा मेरे कुल को, सब सर्वनाश कर डाला था।
क्या ऐसा था अपराध मेरा, या आँखों में तेरी जाला था।

सीता कुल गौरव तेरी थीं, मैंने उनको तो छुआ नहीं।
क्यों सर्वनाश मेरा इतना, मुझसे ऐसा कुछ हुआ नहीं।
गौरव थी मेरी सूर्पनखा, जिसकी नसिका को काट दिया।
हे राम सत्यपथ के गामी, न लक्ष्मण को क्यों डाँट दिया।

गौरव तेरा  तो मेरा भी, बस इतना ही समझाना था।
मकसद बस मेरा इतना सा सीता को लेकर आया था।
हो सकती बात बैठकर भी, तुम तो ईश्वर के अवतारी।
मैं पढ़ा लिखा वेदों का था, माना था थोड़ा अभिमानी।।

मुझको मारा गलती छोटी, हो आज तलक तुम मार रहे।
रावण-रावण, रावण-रावण, कह करके सब दुत्कार रहे।
ऐसा प्रतिमान बनाया की मेरी थू-थू सारे जग में।
तुम राजा सिर्फ अयोध्या के, था राज मेरा पत,धर,नभ में।

इक काम करो हे राम सुनो, मैं माफ तुम्हें कर देता हूँ।
तुम फूंको रोज भले मुझको, मैं उसको भी सह लेता हूँ।
पर राम मेरे न चुप बैठो, जो बलात्कार लाखों होते।
महसूस करो उस नारी को, अन्याय सदा जिस पर होते।

उस बच्ची की क्या गलती थी, जो स्तनपान किया करती।
उस रावण का कुछ हुआ नहीं,क्या राम तुम्हारी थी मर्जी।
उस धर्म पुजारी को देखो, जो नाम तिहारा लेता था।
बस इसी नाम के पीछे वह, कृत्य सभी कर लेता था।

हे राम कहो अवतार तेरा, मर्दन को मेरे ही होता।
छुपे कँहा तुम रहते हो, शर धनुष कँहा तेरा होता।।
हे राम तेरी ये चुप्पी अब, सारा जग को है खूब खले।
तुम स्वयं बताओ राम मेरे, रावण क्यों तुमसे आज जले।।

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©®योगेश योगी किसान
फ़ोटो- साभार

सोमवार, 23 सितंबर 2019

देश जागरण करने वाले काव्य के पुरोधा राष्ट्र गौरव #रामधारी_सिंह_दिनकर जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन।
एक रचना समर्पित-

लिखता हूँ मैं देश का #वंदन, लिखता जन की पीर को।
लिखता हूँ #किसान की माटी, लिखता सीमा के वीर को।।
लिखता हूँ मैं #राजनीति से, उपजे देश के छालों को।
जाति #व्यवस्था के सीने पर, पार हुए उन भालों को।।
लिखता हूँ मैं नींव का पत्थर, #दबी हुई आवाजों को।
जो जनता को हक़ न देते, लिखता उन #सरताजों को।।
जब तक भारत मे #शोषण है, बात लिखूँ अपमानों की।
गाथा कैसे कलम लिखेगी, चाटुकार #बेईमानों की।।
मैं #दिनकर का वंशज हूँ, मैं #संविधान की बात करूँ।
माँ शारद ने जिम्मा सौंपा, कैसे मैं #आघात करूँ।।
सुन लो कोई #कवि नहीं, दर्दों को गाने वाला हूँ।
माँ के दामन का जिम्मा है, उसका मैं #रखवाला हूँ।।
समरसता जब न मिलती तब, #इंकलाब लिख जाता हूँ।
जनमानस की #पीड़ा को तब, मैं शब्दों में गाता हूँ।।

©®योगेश योगी किसान

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सोमवार, 5 अगस्त 2019

आज जिसने जिसने 370 का विरोध किया उनकी एक लिस्ट सार्वजनिक तैयार होनी चाहिए चाहे वह किसी भी पार्टी का हो, और सभी LoC में एकत्रित करके डायनामाइट लगा कर उड़ा देना चाहिए, ताकि दुनिया देखे की भारत गद्दारों के साथ क्या करता है। सुवर के नाजायजों,हरामीयों सीधी बात देशद्रोहियों की कमी नहीं है हिंदुस्तान में उनको जवाब देती और देश के शौर्य का गुणगान करती मेरी रचना।



लाखों शीश चढ़ा देंगे हम देश तेरे आह्वान पर।
माँ का मस्तक नहीं झुकेगा कमी न होगी शान पर।।

मोदी की सेना ने अबकी देश को एक बनाया है।
कश्मीर से दक्षिण तक इक संविधान चलाया है।।

धारा 370 का यह दाग देश पर धब्बा था।
चाहने वाले इसको सुनलें पाक तुम्हारा अब्बा था।।

कश्मीर जागीर नहीं है सुनो किसी के बाप की।
फन जिसका ऊपर निकलेगा कुचलेंगे उस सांप की।।

महबूबा हो या  फारुख हो सुन ले नहीँ निवेदन है।
बार बार जो समझाते थे न ही वो प्रतिवेदन है।।

अबकी तुमको जाना होगा पाक तुम्हारा देश है।
कश्मीर में नहीं इंच भर धरा तुम्हारी शेष है।।

LOC की बात छोड़ दो इंच इंच गारत कर देंगे।
कराची इस्लामाबाद पेशावर पूरा भारत कर देंगे।।

गले लगाया कश्मीर को तब-तब पत्थर खाए हैं।
अब आँसू दिखलाते क्यों हो तब क्यों नहीं बहाए हैं।।

एक एक पत्थर का सुन लो हिसाब किया है मोदी ने।
अलगावी जेहादी सुन लें जवाब दिया है मोदी ने।।

अभी वक्त है चरण थाम लो गले लगाकर देख लिया।
हमने भी है वक्त से सीखा घावों को अब सेंक लिया।।

जो जैसा अब बोलेगा उसको वैसा इनाम मिले।
तमगे जूते गोली लायक जैसा जो सम्मान मिले।।

शुरुवात है स्वर्णिम युग की शहंशाह अब बोला है।
इक-इक करके कामों वाला नया पिटारा खोला है।।

होगा नव निर्माण देश का सब्र करो यह जान लो।
भारत विश्व गुरु अब होगा बात मेरी तुम मान लो।।

कहता योगी देश बड़ा ,जन-जन का  ये सम्मान है।।
तन मन धन हर जन्म मेरा सबकुछ इस पर कुर्बान है।।


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©®योगेश योगी किसान

मंगलवार, 18 जून 2019

पहले उप्र फिर बिहार फिर सूरत फिर बिहार अगला स्थान क्या आपका शहर या गाँव...बच्चों की लगातार मौत से दिल आहत हुआ बस शब्द निकल पड़े😭

मरते बच्चे देख रहे हो, दर्द हुआ या नही हुआ।
हेरोइन जब मरती है तब, दुख में साहब ट्वीट हुआ।।
देश चाहता बुलेट नहीं है, न ही मंदिर मस्जिद अब।
बच्चे सब मर जाएंगे तो, पूजा होगी कैसे कब।।
बुनियादी सुविधाएं रोएं, शिक्षा स्वास्थ्य बड़ी घटिया।
देशभक्ति का रंग चढ़ा कर, बातों से डालो पटिया।।
नहीं जरूरत मंगल जाना, न बुलेट ट्रेन की बातें हो।
लाल मेरे ज़िंदा रह जाएं, चैन से उनकी रातें हो।।
ऑक्सीजन कि कमी से मर गए, गोरखपुर हम भूल गए।
सूरत में किस कमी से बच्चे, सीधे छत से कूद गए।।
देखो हाल बिहार का साहब, दो बारी दुहराया है।
एसी में बैठे प्लानर को, अब तक समझ न आया है।।
क्यों होती हैं मौतें इतनी, बच्चे मरें किसान मरें।
बिना युद्ध के रोज रोज ही, सीमा पर जवान मरें।।
बच जाए यदि बेटी तो, कब लूट जाएगी पता नहीं।
कुछ हठधर्मी कहते हैं कि, घटना है यह खता नहीं।।
संताने यदि होती तो, शायद तुम दर्द समझ पाते।
एक बच्चे के मर जाने पर, बदहवास से हो जाते।।
खुद के लिए सैलरी भत्ता, रोज रोज बढ़वाते हो।
राष्ट्रभक्ति जब करते हो सब, क्यों वेतन ले जाते हो।।
इस वेतन से ही कुछ कर दो, शायद मौतें रुक जाएँ।
राष्ट्रवाद की जय-जय होगी, नतमस्तक सब हो जाएँ।।
ऐसा ही गर चला तो साहब, बच्चे सब मर जाएँगे।
सीमा पर लड़ने को सैनिक, कहो कँहा से लाएँगे।।



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©®योगेश योगी किसान

मंगलवार, 4 जून 2019

बुलेट नहीं जनरल ट्रेन लाओ

जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई,
एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़।
दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था।
जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है।
टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए।
" ये जनरल टिकट है।अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना।वरना आठ सौ की रसीद बनेगी।"
कह टीसी आगे चला गया।
पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।
सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे।
 बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे।
 लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे।
" साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते।हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे।बड़ी मेहरबानी होगी।"
टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा।
" सौ में कुछ नहीं होता।आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ।"
" आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब।नाती को देखने जा रहे हैं।गरीब लोग हैं, जाने दो न साब।" अबकि बार पत्नी ने कहा।
" तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो।एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।"
" ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला।
" नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी।देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है।एक लाख करोड़ का खर्च है।कहाँ से आयेगा इतना पैसा ? रसीद बना-बनाकर ही तो जमा करना है।ऊपर से आर्डर है।रसीद तो बनेगी ही।
चलो, जल्दी चार सौ निकालो।वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ।"
इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला।
आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो।
 पास ही खड़े दो यात्री बतिया रहे थे।
" ये बुलेट ट्रेन क्या बला है ? "
" बला नहीं जादू है जादू।बिना पासपोर्ट के जापान की सैर। जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हबाई सफ़र के बराबर होगा, बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा। एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है। राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए।
सुना है, "अच्छे दिन " इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं। "
उनकी इन बातों पर आसपास के लोग मजा ले रहे थे। मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे
ऐसे बैठे थे ,मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके शोक  में जा रहे हो।
कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए?
 क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा?
नहीं-नहीं।
आखिर में पति बोला- " सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा।मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए।"
" ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।"
पत्नी के कहा।
 " मगर मुन्ने के कम करना....""
और पति की आँख छलक पड़ी।
" मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे। "
कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी।
फिर आँख पोंछते हुए बोली-
" अगर मुझे कहीं मोदीजी मिले तो कहूंगी-"
 इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो।"
उसकी आँख फिर छलक पड़ी।
" अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं, हमें
मोदीजी को वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत।

(विनम्र प्रार्थना है जो भी इस कहानी को पढ़ चूका है उसे इस घटना से शायद ही इत्तिफ़ाक़ हो पर अगर ये कहानी शेयर करे ,कॉपी पेस्ट करे ,पर रुकने न दे शायद रेल मंत्रालय जनरल बोगी की भी परिस्थितियों को समझ सके। उसमे सफर करने वाला एक गरीब तबका है जिसका शोषण चिर कालीन से होता आया है।)

ईद मुबारक #Eidmubarak

  झूठों को भी ईद मुबारक, सच्चों को भी ईद मुबारक। धर्म नशे में डूबे हैं जो उन बच्चों को ईद मुबारक।। मुख में राम बगल में छुरी धर्म ध्वजा जो ...